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दान से वस्तु घटती नहीं बल्कि बढ़ती है

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एक व्यक्ति का मन इस बात में होता है की वह क्या दे सकता है , इसमें नहीं की वह क्या पा सकता है

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जब घर में धन और नाव में पानी आने लगे, तो उसे दोनों हाथों से निकालें. ऐसा करने में बुद्धिमानी है. हमें धन की अधिकता सुखी नहीं बनाती

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सर्वे भवन्तु सुखिन : सर्वे सन्तु निरामया

सिर्फ एक धारणा नहीं है | यह मूर्त रूप ले सके ,इसके लिए व्यवस्था भी बनाई गई है | दान उसी व्यवस्था का एक हिस्सा है | कहा जाता है की बांटने से दुःख घटते है , जबकि सुख बढ़ते है | दान सुख की साझेदारी का जरिया है | अगर रुढियो से मुक्त होकर दान की सच्ची अवधारणा को समझा और उस पर अमल किया जा सके तो यह मनुष्यता के समग्र कल्याण का माध्यम बन सकता है |

सर्वे भवन्तु सुखिन : की सोच की और मोड़ता है | इसलिए दान में अन्न , जल , वस्त्र , धन - धान्य , शिक्षा , गाय – बेल आदि दिए जाने की रीती है दान की परंपरा का आधार ही यह सोच है की दान से अगर किसी जरूरतमंद को लाभ मिलता है तो यह सम्पूर्ण समाज के लिए लाभकारी है इसलिए सही मायनो में देखा जाये तो दान एक सामाजिक व्यवस्था है | ज्जिसे आध्यात्मिक भूमि पर समाज में संतुलन बनाने के उदेश्य से ही खड़ा किया होगा | यही कारण है की दान किसे दिया जाये , यह भी एक बड़ा सवाल है | जिस व्यक्ति को दान दिया जाता है उस व्यक्ति को दान का पात्र कहते है |

अवधेश अनिल अरजरिया

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Our Causes

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दान करना ही है तो भूखे को रोटी दान कर..ऐ इंसान....यूं कब तक मंदिरों मस्जिदों को करोड़पति बनाता रहेगा

Education for all (DAANI)

कुछ दान करना है तो विद्या बाँटो गर एक को भी आत्मनिर्भर बना सके तो देश की प्रगति हुई समझो..

childrens(DAANI)

तुलसी पंछिन के पिये, घटै न सरिता-नीर। दान दिये धन ना घटै, जो सहाय रघुबीर।